भागवत पीयुष, परम श्रद्धेय स्वामी श्री दीनदयालु जी महाराज का संक्षिप्त परिचय

अनन्तश्री विभूषित श्री स्वामी करपात्री जी महाराज के विशेष कृपापात्र शिष्य परम पुज्यपाद भागवत भूषण, स्वामी श्रीदीनदयालुजी महाराज का प्रादुर्भाव मध्यप्रदेश के जबलपुर जिले के आदिवासी क्षेत्र में हुआ । अपने बाल्यकाल में आप पर पूर्वजों के सर्वहितवादी एवं आध्यात्मिक विचारधाराओं का प्रभाव पड़ा जो प्रतिफल आपके कार्यो के माध्यम से परिलक्षित होते हैं । विगत वर्षो के अपने जीवनकाल में आपने मुख्यत: जबलपुर काशी व वृन्दावन में विभिन्न धार्मिक एवं साहित्यिक ग्रंथो का गहन व विश्लेष्णात्मक अध्ययन किया है ।

आप परमपुज्य सदगुरुदेव धर्मसम्राट ब्राह्मलीन अनंत श्री विभुषित श्री स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा स्थापित पूजा पद्धति, ज्ञान-गंगा और प्रेम रस को जन-जन तक पहुचाने का सतत प्रयास कर रहे हैं । साथ ही अनंत स्वामी अखंडानन्दजी महाराज, शुकदेव स्वरुप जी डोंगरे जी महाराज से भी प्रभावित एवं प्रेरणा प्राप्त की । स्वामी श्रीदीनदयालुजी महाराज का कार्यक्षेत्र विस्तृत रहा है | आपने देश-विदेश के कोने-कोने में जाकर श्री भागवत गीता, श्री रामायण, श्री मद्भागवत पुराण, श्री देवी भागवत, श्री शिव पुराण, श्री गणेश पुराण, श्री सूर्यपुराण एवं वेदान्त आदि ग्रंथो पर प्रवचन कार्यो में सलग्न रहे हैं । आप विगत पच्चास वर्षो से प्रतिवर्ष नियमित रूप से कथाएँ कर रहे हैं जो कहने-सुनने में साधारण बात लग सकती है, पर जिसे निभा पाना एक अमृतपूर्वक और दिव्य कार्य है ।

स्वामी श्री करपात्री जी महाराज

स्वामी श्री दीनदयालुजी महाराज

भागवत पीयुष, परम श्रद्धेय स्वामी श्री दीनदयालु जी महाराज का संक्षिप्त परिचय

अनन्तश्री विभूषित श्री स्वामी करपात्री जी महाराज के विशेष कृपापात्र शिष्य परम पुज्यपाद भागवत भूषण, स्वामी श्रीदीनदयालुजी महाराज का प्रादुर्भाव मध्यप्रदेश के जबलपुर जिले के आदिवासी क्षेत्र में हुआ । अपने बाल्यकाल में आप पर पूर्वजों के सर्वहितवादी एवं आध्यात्मिक विचारधाराओं का प्रभाव पड़ा जो प्रतिफल आपके कार्यो के माध्यम से परिलक्षित होते हैं । विगत वर्षो के अपने जीवनकाल में आपने मुख्यत: जबलपुर काशी व वृन्दावन में विभिन्न धार्मिक एवं साहित्यिक ग्रंथो का गहन व विश्लेष्णात्मक अध्ययन किया है ।

आप परमपुज्य सदगुरुदेव धर्मसम्राट ब्राह्मलीन अनंत श्री विभुषित श्री स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा स्थापित पूजा पद्धति, ज्ञान-गंगा और प्रेम रस को जन-जन तक पहुचाने का सतत प्रयास कर रहे हैं । साथ ही अनंत स्वामी अखंडानन्दजी महाराज, शुकदेव स्वरुप जी डोंगरे जी महाराज से भी प्रभावित एवं प्रेरणा प्राप्त की । स्वामी श्रीदीनदयालुजी महाराज का कार्यक्षेत्र विस्तृत रहा है | आपने देश-विदेश के कोने-कोने में जाकर श्री भागवत गीता, श्री रामायण, श्री मद्भागवत पुराण, श्री देवी भागवत, श्री शिव पुराण, श्री गणेश पुराण, श्री सूर्यपुराण एवं वेदान्त आदि ग्रंथो पर प्रवचन कार्यो में सलग्न रहे हैं । आप विगत पच्चास वर्षो से प्रतिवर्ष नियमित रूप से कथाएँ कर रहे हैं जो कहने-सुनने में साधारण बात लग सकती है, पर जिसे निभा पाना एक अमृतपूर्वक और दिव्य कार्य है ।

भगवान श्रीकृष्ण के दिव्य ज्ञान और भागवत रसामृत को अपने प्रिय शिष्यों और भक्तो में प्रवाहित करना ही आपके जीवन का परम लक्ष्य है । उनकी वाणी की सरलता और माधुर्या और प्रभु-प्रेम से ओत-प्रोत रसपूर्ण बातें अनायास ही सर्वसाधारण को आकर्षित करती है । अनायास ही उनके प्रिये भक्त कह उठते हैं -

सब नातों से प्यारा नाता । भक्त-भगवान का दिव्य नाता ।।

आप विगत पच्चास वर्षो से अधिक समय प्रतिवर्ष कथा रस से जन-जन को सराबोर कर रहे हैं । जो की एक असाधारण, अमृतपूर्वक व दिव्य कार्य है ।

आप ही के शुभ संकल्प व प्रयास से वर्तमान में जबलपुर (मध्य प्रदेश), वृन्दावन (उत्तरप्रदेश), झाँसी (हरियाणा), एवं हिमाचल प्रदेश और नव निर्मित हरिद्वार क्षेत्र (उत्तराखंड ) में योगाश्रम, वृद्धाश्रम एवं निशुल्क औषधालय आदि आश्रमों की स्थापना हुई है । इन आश्रमों में गौशाला, संस्कृत विद्यालय, संत सेवा, अनाथ सेवा एवं साधको का मार्गदर्शन आदि कार्य व्यस्थित रूप से चल रहे हैं । हरिद्वार (उत्तराखंड ) में डेढ़ एकड़ भूमि में वृधाश्रम, योगाश्रम एवं निशुल्क औषधालय आदि चल रहे हैं । भ्रांत जनसमुदाय को भगवद्भक्ति के मार्ग पर ले जाना उन्हें सन्मार्ग का पथिक बना देना आपके कथा प्रवचनों का मुख्य उद्देश्य है ।

स्वामी श्री दीनदयालु जी की अनेक रचनाएँ प्रकशित हो चुकी है जिनमे से कुछ प्रमुख रचनाएँ हैं -
  • नोमेस्तु रामायण
  • पूजा प्रकाश
  • गणेश पुराण
  • मातृ तत्व
  • प्रभु ने क्यों और कहाँ
  • भक्ति योग
  • भागवत रसामृत
  • प्रह्लाद गीता
  • ज्ञान योग
  • शिव तत्व
  • एक सहारा
  • ध्यान योग
  • मातृ तत्व
  • राम गीता
  • पंचामृत
  • दुःख की जड़ काम, सुख की जड़ राम
  • कुरुक्षेत्र गीता
  • अमृत कण

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